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यूपी चुनाव : कड़ाके की सर्दी में मौर्य का तड़का, गरमाई सियासत

 कड़ाके की ठंड में चढ़ा यूपी का चुनावी पारा


दिल्ली / सुनील कोहाड़/ तहलका न्यूज 

    पूरा उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड ने लोगों की कंप कंपी छुड़वाई हुई है। वहीं उत्तर प्रदेश में ठिठुरन भरी सर्दी के बीच चुनावी पारा लगातार चढ़ता ही जा रहा है। जैसे जैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं वैसे ही 

उत्तर प्रदेश की सियासत अपने रंग में रंगने लगी है। पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा को अलविदा कर कमल का दामन थामने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य ने चुनावी बिगुल बजते ही भाजपा को भी अलविदा कह दिया। जिसके बाद उत्तर प्रदेश की सियासत में मानों भूचाल आ गया हो। 

 अब मौर्य के समाजवादी पार्टी में शामिल होने की संभावना जताई जा रही हैं। सवाल ये उठता है कि चुनावी रणभेरी में एकदम से स्वामी प्रसाद मौर्य के पाला बदलने से भाजपा पर कितनी भारी पड़ती है ? मौर्य उत्तर प्रदेश की काफी सीटों का गणित बनाने और बिगाड़ने का माद्दा रखते हैं। अब ये तो समय ही बताएगा कि इस चुनाव में वो किसके लिए क्या समीकरण बना पाते हैं। इसको लेकर सभी राजनीतिक पार्टियां जोड़ घटा करने में जुटी हुई हैं। हाल ही में हुए उलटफेर से  जातिगत समीकरण में कितना बदलाव आ गया?



करीब 100 सीटों पर खेल बनाने बिगाड़ने ‌क आ माथा है क्या स्वामी में ?

स्वामी प्रसाद मौर्य गैर यादव ओबीसी समुदाय के बड़े चेहरा के तौर पर उतर प्रदेश की राजनीति में माने जाते हैं। वो कुशीनगर पडरौना विधानसभा सीट से विधायक हैं,  परंतु उनकी पकड़ रायबरेली, ऊंचाहार, शाहजहांपुर और बदायूं तक मानी जाती है। राजनीतिक लोगों द्वारा दावा किया जा रहा है कि स्वामी प्रसाद मौर्य के सपा में शामिल होने से भाजपा का इन क्षेत्रों में आने वाली करीबन 100  सीटों का गणित बिगड़ सकता है और  संकट का सामना करना पड़ सकता है और जिससे खेल बिगड़ सकता है। क्योंकि 2017 के विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की सफलता में गैर यादव ओबीसी का काफी अहय योगदान रहा था। इसके अलावा मौर्य की बेटी संघमित्रा बदायूं से सांसद हैं। ऐसे में स्वामी प्रसाद को उसका भी फायदा मिलना स्वाभाविक माना जा सकता है। 



क्या सपा को मिलेगा जातिगण समीकरण का फायदा ? 

स्वामी प्रसाद मौर्य द्वारा भाजपा छोड़ समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश के चुनावी रण में माहौल बना सकता है। क्योंकि उतर प्रदेश राज्य में यादव और कुर्मी के बीच मौर्य ओबीसी समुदाय का सबसे बड़ा माना जाता है और स्वामी प्रसाद मौर्य इस जाति से ही आते हैं। जिनमें काछी, मौर्य, कुशवाहा, शाक्य और सैनी जैसे उपनाम भी इस समुदाय का हिस्सा हैं और इन जातियों पर स्वामी प्रसाद मौर्य की अच्छी पकड़ बताई जा रही है। आबादी के लिहाज से भी देखें तो उत्तर प्रदेश के आठ फीसदी लोग इसी समुदाय से संबंध रखते हैं। वहीं, वोट बैंक के आंकड़ों पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ा वोटबैंक पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का माना जाता है। जोकि लगभग 52 फीसदी पिछड़े वोट बैंक में 43 फीसदी वोट बैंक गैर यादव समुदाय का है। हालांकि, ये वोट पूरा का पूरा अब तक किसी भी चुनाव में एकजुट नजर नहीं आया। ऐसे में सभी राजनीतिक दल गैर यादव वोटों को अपने पाले में लाने की जुगत बिठाने की कोशिश कर रहे हैं

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अखिलेश ने चला मास्टरस्ट्रोक

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि स्वामी प्रसाद मौर्य को अपने पाले में लाकर अखिलेश यादव ने मास्टरस्ट्रोक चाल दिया है। वो पिछले काफी समय से पिछड़ों को एकजुट करने की जुगत बिठाने में लगे हुए थे। दावा किया जा रहा है कि पिछड़ी जातियों से ताल्लुक रखने वाले कई और विधायक भाजपा को छोड़कर सपा का साथ देने का मन‌ बना चुके हैं। इससे अखिलेश यादव को गैर यादव वोट आसानी से अपनी ओर खींचने में मदद मिल सकती है। समाजवादी पार्टी काफी समय पहले से ही गैर यादव वोट के लिए बड़े चेहरे की फिराक में थी और स्वामी प्रसाद मौर्य के आने से ये तलाश पूरी होने की उम्मीद जताई जा रही है। अब ये तो चुनावी रणभेरी ही साफ कर पाएगी कि किस में कितना है दम।‌


स्वामी प्रसाद मौर्य के बारे में लोगों का मानना है कि वह हवा का रुख देखकर पाला बदलने में माहिर हैं। 2017 विधानसभा चुनाव से पहले स्वामी प्रसाद को बहुजन समाज पार्टी में बड़े चेहरे के तौर पर देखा जाता था। उनका कद इतना बड़ा था कि मायावती ने मीडिया में किसी भी मामले को लेकर बोलने की इजाजत सिर्फ उन्हें ही दे रखी थी। जब उन्हें मोदी लहर का एहसास हुआ तो उन्होंने बसपा को बाय बाय कर भाजपा का दामन थाम लिया था। बसपा से पहले वह जनता दल में भी रह चुके हैं।


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