पंचों-सरपंचों, नंबरदारों के घर-आंगन व खेतों में हुआ विकास, गाँवों का सत्यानाश
केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा गाँवों के विकास के लिए सैकड़ों योजनाएं शुरु की गई हैं जिनके तहत हर साल करोड़ों रूपए की राशि ग्राम पंचायतों को आवंटित की जाती है। (corruption-in-village) अब ग्राम पंचायतों, पंच-सरपंचों द्वारा गाँवों में कितना विकास करवाया जा रहा है, यह तो गाँव की दुर्दशा खुद-ब-खुद बयां कर देती है।गाँव का विकास हो न हो, इन पंच-सरपंचों, नंबरदारों, इनके परिजन, रिश्तेदारों, चेले-चपाटों व चापलूसों का विकास जरुर हो जाता है। किसी भी गाँव में नजर दौड़ा ली जाए वहां के पंच, सरपंच, नंबरदार व रसूखदारों के घर में सरकारी पैसे के दुरुपयोग की तस्वीर जरुर देखने को मिल जाएगी। किसी पंच, सरपंच, नंबरदार के घर के आंगन में सरकारी ब्लॉक लगे मिलेंगे तो किसी पंच-सरपंच, रसूखदार के पशुओं के बाड़े में। यहां तक की सोलर लाईटें भी इन्हीं पंच-सरपंचों व इनके चेले-चपाटों, चापलूसों के घर-आंगन की शोभा बढ़ा रही होंगी। अधिकतर पंच-सरपंचों द्वारा सरकारी पैसे या सरकारी निर्माण सामग्री का इस्तेमाल अपने खुद के घर की मुरम्मत व निर्माण में भी कर लिया गया है जिसे जानता सारा गाँव है लेकिन बोलने की हिम्मत किसी एक में नहीं। जिला हिसार के नारनौंद अंतर्गत गाँव लोहारी राघो में भी कई पंचों, नंबरदारों व ब्लॉक समिति सदस्यों द्वारा अपने घर-आंगन व पशुओं के बाड़े में सरकारी ब्लॉकों का सरेआम इस्तेमाल किया गया है लेकिन गाँव में दबी जुबान खुसर-फुसर करने के अलावा खुलकर बोलने में हर कोई गुरेज कर रहा है। सभी जानते हैं इस गाँव के पंच-सरपंच व नंबरदारों पर सत्ता में बैठे कुछ सफेदपोशों का हाथ है। इसलिए जहां मर्जी शिकायत कर लो, इनका कुछ नहीं बिगड़ने वाला। उल्टा ये लोग शिकायत करने वाले को ही झूठे मुकदमें में उलझाकर अंदर करवाने का दम रखते हैं। पहले गाँव के विकास के लिए आया पैसा डकारेंगे, फिर किसी ने आवाज उठाने की कोशिश की तो नेता जी का नाम लेकर उसे धमकी देंगे और अंदर करवाकर ही दम लेेंगे। ये सब हो रहा है इस ईमानदार मनोहर सरकार में। और बेशर्म नेता भी वोटों के लालच में खुलकर ऐसे भ्रष्टाचारियों का साथ देते चले जाते हैं। गाँव के विकास के लिए आया पैसा अपने घर-आँगन,खेत व निजी हित में इस्तेमाल करने वाले भ्रष्टाचारियों का साथ देना नेताओं के लिए किस हद तक जायज है। मतलब साफ है नेता ही गाँवों में भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं। अकेले लोहारी राघो ही नहीं लगभग हर गाँव की यही कहानी है।

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