राखी गढ़ी के बाद अब लोहारी राघो में इंग्लैंड के छात्र जुटे खुदाई में
खुदाई के दौरान काफी अहम अवशेष मिलने की संभावना
नारनौंद :
करीब 6 हजार वर्ष पुरानी हड़प्पाकालीन सभ्यता के लिए राखी गढ़ी पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। इस संस्कृति के रहस्य से पर्दा उठाने के लिए अब इंग्लैंड की कैम्ब्रीज यूनिवर्सिटी के छात्र लोहारी राघो में खुदाई कर रहे हैं। खुदाई के दौरान जो ऐतिहासिक चीजें सामने आ रही हैं उससे लगता है कि हड़प्पाकालीन सभ्यता का क्षेत्र बहुत ही बड़ा रहा होगा। खुदाई के दौरान इस संस्कृति के जो अवशेष मिल रहे हैं उनसे उन लोगों के रहन सहन का भी पत्ता लगाया जा रहा है।
राखी गढ़ी में हड़प्पाकालीन सभ्यता के अनेकों अवशेष मिल चुके हैं। इस सभ्यता की खुदाई सन 1997 में आरकेलोजी सर्वे ऑफ इंडिया के डायरेक्टर डा. अरमेन्द्र नाथ की अगुवाई में की गई थी। ये सभ्यता करीब 900 एकड़ भूमि पर क्षेत्र में फैली हुई है। गांव राखी गढ़ी, राखी खास, गामड़ा, हैबतपुर, लोहारी राघो गांव के एरिए में इस सभ्यता के अवशेष पाए जाते है। इस सभ्यता के अनेकों अवशेष पाए जा चुके हैं। अब इंग्लैंड की कैम्ब्रीज यूनिवर्सिटी के छात्र व बनारस के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र गांव लोहारी राघो में हड़प्पाकालीन सभ्यता के रहस्यों को जानने के लिए खुदाई कर रहे हैं। अभी तक खुदाई में कोई खास अवशेष सामने नहीं आए हैं। प्रो. अरूण पांडे, डा. धीरेन्द्र, एलैक्स ऐलिना, आरती, सुर्दशन, अमित इत्यादि छात्रों ने बताया कि उन्हें प्रारंभिक खुदाई में ये आभास हो चुका है कि इस खुदाई में हड़प्पाकालीन की अनेकों अवशेष मिलेगें।
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कैम्ब्रीज यूनिवर्सिटी के प्रो. कैपन पैट्री ने बताया कि पूरास्थलों को जानने के लिए ये खुदाई शुरू की गई है। इससे पत्ता चलेगा कि हड़प्पाकालीन के समय लोगों का रहन सहन व जीवन यापन किस प्रकार का होता था। राखी गढ़ी के बाद लोहारी राघो इस सभ्यता के लिए काफी बेहतरीन साईट होगी। इस साईट में अनेक रहस्यों से पर्दा उठ सकेगा।
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राखी गढ़ी के टीलों की खुदाई से पहले केन्द्र सरकार ने सन 1996 में 150 एकड़ भूमि को अपने कब्जे में लिया था। जिनमें से 138 एकड़ भूमि पंचायत की थी और 12 एकड़ भूमि निजी लोगों की संपति थी। उसके बाद टीलों को सात जोनों में बांटकर उनकी खुदाई की गई थी।
खुदाई के दौरान काफी अहम अवशेष मिलने की संभावना
नारनौंद :
करीब 6 हजार वर्ष पुरानी हड़प्पाकालीन सभ्यता के लिए राखी गढ़ी पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। इस संस्कृति के रहस्य से पर्दा उठाने के लिए अब इंग्लैंड की कैम्ब्रीज यूनिवर्सिटी के छात्र लोहारी राघो में खुदाई कर रहे हैं। खुदाई के दौरान जो ऐतिहासिक चीजें सामने आ रही हैं उससे लगता है कि हड़प्पाकालीन सभ्यता का क्षेत्र बहुत ही बड़ा रहा होगा। खुदाई के दौरान इस संस्कृति के जो अवशेष मिल रहे हैं उनसे उन लोगों के रहन सहन का भी पत्ता लगाया जा रहा है।
राखी गढ़ी में हड़प्पाकालीन सभ्यता के अनेकों अवशेष मिल चुके हैं। इस सभ्यता की खुदाई सन 1997 में आरकेलोजी सर्वे ऑफ इंडिया के डायरेक्टर डा. अरमेन्द्र नाथ की अगुवाई में की गई थी। ये सभ्यता करीब 900 एकड़ भूमि पर क्षेत्र में फैली हुई है। गांव राखी गढ़ी, राखी खास, गामड़ा, हैबतपुर, लोहारी राघो गांव के एरिए में इस सभ्यता के अवशेष पाए जाते है। इस सभ्यता के अनेकों अवशेष पाए जा चुके हैं। अब इंग्लैंड की कैम्ब्रीज यूनिवर्सिटी के छात्र व बनारस के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र गांव लोहारी राघो में हड़प्पाकालीन सभ्यता के रहस्यों को जानने के लिए खुदाई कर रहे हैं। अभी तक खुदाई में कोई खास अवशेष सामने नहीं आए हैं। प्रो. अरूण पांडे, डा. धीरेन्द्र, एलैक्स ऐलिना, आरती, सुर्दशन, अमित इत्यादि छात्रों ने बताया कि उन्हें प्रारंभिक खुदाई में ये आभास हो चुका है कि इस खुदाई में हड़प्पाकालीन की अनेकों अवशेष मिलेगें।
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कैम्ब्रीज यूनिवर्सिटी के प्रो. कैपन पैट्री ने बताया कि पूरास्थलों को जानने के लिए ये खुदाई शुरू की गई है। इससे पत्ता चलेगा कि हड़प्पाकालीन के समय लोगों का रहन सहन व जीवन यापन किस प्रकार का होता था। राखी गढ़ी के बाद लोहारी राघो इस सभ्यता के लिए काफी बेहतरीन साईट होगी। इस साईट में अनेक रहस्यों से पर्दा उठ सकेगा।
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राखी गढ़ी के टीलों की खुदाई से पहले केन्द्र सरकार ने सन 1996 में 150 एकड़ भूमि को अपने कब्जे में लिया था। जिनमें से 138 एकड़ भूमि पंचायत की थी और 12 एकड़ भूमि निजी लोगों की संपति थी। उसके बाद टीलों को सात जोनों में बांटकर उनकी खुदाई की गई थी।

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