भाई ने हड़प ली जमीन जायदाद, संन्यासी बनने नहीं दिया तो पत्नी व बच्चों का कत्ल कर खुद ने किया सुसाइड
पिता के देहांत के बाद मां भाई की देखभाल के लिए की शादी, लेकिन भाई बहनों ने उसे ठुकराया, हड़प लिया सबकुछ
हिसार- तहलका न्यूज
नंगथला के रमेश ने सुसाइड नोट में लिखा पत्नी की क्या थी राय, पैसों की कमी नहीं, 50 हजार रुपए कमाने के बाद भी किस रोग का उपचार नहीं करवा पा रहा था रमेश, दुनियादारी से क्यों रहता था खफा, सुसाइड नोट में अपने परिवार की हत्या के कबूल करने के अलावा क्या क्या लिखा, संन्यासी बनने से किसने रोका और पत्नी व बेटी की हत्या क्यों की सब बातों का रमेश ने इस सुसाइड नोट में लिखा।
रमेश ने सुसाइड नोट लिखा है जयदेव के लिए। आप सब से माफी जयदेव जी। बहुत दुख दे रहा हूं लेकिन मासूम भी भोली भी सविता और नादान बच्चों को बेरहम दुनिया में अकेला नहीं छोड़ सकता। इनको भी साथ ले जा रहा हूं। सबसे माफी बेशक कितना भी बुरा हों, उससे ज्यादा बुरा बन के जा रहा हूं। सिर्फ आपका अपराधी हूं बाकी दुनिया का नहीं, सुख के दिनों में दुखी कर के जा रहा हूं। अपना ख्याल रखना। वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा। संदीप से भी माफी, पिछले साल आपको बताया था लेकिन ये सब होना ही था। सिर्फ आपका अपराधी हूं और किसी का नहीं। आपका रमेश,
जो भी लिख रहा हूं उसको पढ़कर अपराधी न समझें
मृतक रमेश ने सुसाइड नोट में लिखा कि जो भी पढ़ रहा है मुझे अपराधी न समझे, रात के 11 बज चुके हैं न दुख है न डर न ही सर्दी लग रही है पता नहीं चला 11 कब बज गए, 2 घंटे लगे सब करने में , उसने सबको नींद की गोलियां खिला दी हैं। जो कुछ कर रहा हूं वो कोई अचानक हुई घटना नहीं हैं। इसके लिए उसे न कोई डर था न कर्ज हैं। 50 हजार तक कमा रहा हूं और दुनियादारी के सब सपने पूरे कर चुका हूं।
जिनकी देखरेख के लिए की थी शादी, उन्हीं ने दिया धोखा
जबसे होंश संभाला है तब से संसारिक सुखों की बजाय दुनिया को अलग नजर से देखता रहा हूं। कदम कदम पर दुनिया की असलियत को समझता रहा हूं । आखिर हम धरती पर क्यों आएं हैं और क्या मकसद लेकर आएं हैं। पता ही नहीं चला कि लोग किस चीज के लिए भाग रहे हैं। मगर काफी समय तक इसी सोच में रहा। कालेज में दर्शन पढ़ने के बाद मन दुनिया से अलग होता चला गया। सब चीज नकली लगने लगी, किसी दुनियावी वस्तुओं में सुख का आनंद नहीं रहा। परंतु दिमाग का एक हिस्सा सांसारिक चीजों और लोगों में था कि इसी बीच पिताजी का देहांत हो गया। यहीं से मेरी जिन्दगी में बरबादी ने कदम रखना शुरू कर दिया। न चाहते हुए भी शादी करनी पड़ी, ताकि मां भाई का ख्याल रख सके। लेकिन मेरे जीवन को खराब करने में सबसे ज्यादा रोल इन्हीं का रहा है। मेरा मन पिछले 15 साल से सन्यासी बन चुका था। मैं मोक्ष मुक्ति चाहता था। मगर गृहस्थी से निकल नहीं पा रहा था। मुझे हमेशा गलत समझा जाने लगा, धीरे-धीरे मेरा दिमाग बदलता गया और अंदर अंदर डरने लगा। छोटे बच्चे मासूम बीबी को छोड़कर जा नहीं सका। इसलिए अलग घर बनाकर रहने लगा, लेकिन जिंदगी के कुछ भी सही नहीं रहा, सब दूर होते चले गए, क्योंकि सब दुनियादारी की चीजों के लालची थे, मैं सांसारिक सुखों की बजाय शांत रहना पसंद करता था। मगर गुस्सा आने पर गुस्से पर काबू नहीं रख सकता हूं।
मेरा मन आत्मा सब संन्यासी हो चुके थे। मगर दुनियादारी की चाक चौबंद सुख भोगने के लिए हर रोज पैसा कमाने के लिए भागदौड़ करनी पड़ती थी और अगले दिन उससे अधिक रुपए कमाने का लालच को देख मेरा मन कहता था कि अब तो बस कर, परंतु मैं पैसा कमाने की मशीन बनकर रह गया था। भाई ने सब प्रोपर्टी हड़प ली थी। जिसके बाद बचे हुए सब सपने भी चकनाचूर हो चुके थे। उसने कभी किसी के सामने न तो जाहिर किया और ना ही विरोध किया कि उसके भाई ने ऐसा क्यों किया। क्योंकि मेरी सविता भी मेरी तरह ही थी। पास में बस जो है उसी में खुश थी। इतना कुछ होने के बाद भी हमने भाई को माफ कर दिया। मैं तो फकीरी में जी रहा था। पिछले 10-15 साल में कई बार घर से निकलकर सन्यास लेने की सोच चुका था। मगर दो साल पहले हुए एक्सीडेंट ने बहुत जल्दी मजबूर कर दिया, शरीर कमजोर हो चुका था। गले में बहुत दिक्कत रहने लगी थी। सांस लेने में खाने में, सोने में, बोलने में काफी परेशानी हो रही थी। दिमाग भी बिल्कुल शांत रहने लगा था। पिछले साल मैंने सबसे सन्यास मांगा कि मुझे मुक्ति दे दो। परंतु सबने दुनियादारी का हवाला देते हुए उसे रोक लिया। वो अक्सर अपनी पत्नी के सामने रोता था कि उसे जाने दो मगर वो हर बार रोक लेती थी।
उसके गले में लगातार दिक्कत बढ़ने लगी थी और इस आपाधापी की दुनियादारी के बीच अपनी पत्नी व मासूम बच्चों को अकेले छोड़कर नहीं जा सकता था। इसलिए सबको अपने साथ ले जा रहा हूं। क्योंकि उसकी पत्नी सविता भी अक्सर साथ जीने मरने की बात करती रहती थी। अब हमारे पीछे कोई रोने वाला नहीं बचा है। क्योंकि भाई बहन लालच में आकर उन्हें पहले ही त्याग चुके हैं। उसने सुसाइड नोट के आखिर में सबसे माफी मांगी और सबको माफ किया लिखा। वहीं रमेश ने लिखा कि आज उसकी लिखाई भी बदली बदली हुई है।
यूं की अंतिम इच्छा जाहिर
हम साथ जा रहें हैं, इसलिए अस्पताल से सीधे शमशान घाट ले जाना, क्योंकि घर में कोई रोने वाला व चाहने वाला नहीं है।
उनकी अस्थियों को हरिद्वार व गढ़ गंगा में प्रवाहित करने की बजाय शमशान घाट में लगे पौधों में ही डाल दे।
उसके घर को खोलें नहीं और ना किसी को दें। क्योंकि अब संन्यासी के रूप में यहीं पर रहेंगे।
दुकान में जो सामान, मशीन हैं उन सबको बेच देना। अगर कोई मेरे पैसे मांगता हो तो उसके चुका देना और बाकि दान कर देना।
मैं कोई मानसिक रूप से परेशान व रोगी नहीं हूं बस शांति चाहता हूं।
रमेश पेंटर नंगथला अग्रोहा

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