कृषि कानून निरस्त के बाद संयुक्त किसान मोर्चा ने लिया बड़ा फैसला, किसान नेता अभिमन्यु कोहाड़ ने दी जानकारी
संसद में कृषि कानून निरस्त होने पर अलग अलग क्षेत्र के किसानों की प्रतिक्रिया
दिल्ली - तहलका न्यूज
तीनों कृषि कानूनों को शीतकालीन सत्र के दौरान लोकसभा और राज्यसभा में कड़े हंगामे के बीच पेश किया गया। सत्र के पहले दिन ही दोनों सदनों में रिफिल कर लिया गया। अब आंदोलन कितने दिन ओर चलेगा, इसक्षपर अब भी सस्पेंस बरकरार है। कृषि कानून निरस्त करने के बाद संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक हुई और अहम मुद्दों पर में किया गया।
नारनौंद के किसान बलवान लोहान, जंगी, शीलू लोहान, कृष्ण पहलवान, भूप लोहान, सतीश माजरा ने कहा कि किसानों की फसल जब मंडी में आती है तो उसे कोड़ियो के भाव खरीदा जाता है और जब किसान की पूरी फसल बिक जाती है तो रेटों में उछाल आ जाता है। जिसका किसान को कोई फायदा नहीं होता। इसलिए किसान एम एस पी पर कानून बनाने की मांग कर रहे हैं। ताकि उनकी फसल का पूरा दाम मिल सके।
छान गांव के किसान उमेद चाहर, राजबीर छान, सुरेंद्र, राजेश, सोमबीर, हरिराम, जोगिंदर सिंह, बिंद्र, कर्णा चाहर इत्यादि ने बताया कि उनके क्षेत्र में अधिकतर नरमा, बाजरा, गेहूं, सरसों की खेती होती है। लेकिन हर बार कभी मौसम की मार से तो कभी फसल में बिमारी आने से फसल खराबे हो जाती है। जिससे बची हुई फसल को व्यापारी खरीदने में आना कानी करते हैं। जिससे फसल की लागत भी पूरी नहीं होती।
किसान नेता अभिमन्यु कोहाड़ ने बताया कि कृषि कानून निरस्त होने का पूरा श्रेय आंदोलन में शहादत देने वाले किसानों को जाता है। उन्होंने कहा कि सरकार ये काले कानून लेकर आई तो किसानों को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा। अगर सरकार ये कानून लेकर नहीं आती तो ना ही किसानों को आंदोलन करना पड़ता और ना ही उनकी गर्मी व सर्दी के मौसम में बाहर रहना पड़ता। जिसके कारण 750 के करीब किसानों को अपनी जान गंवानी पड़ी और हजारों किसानों पर मामले दर्ज होते। आज तक सरकार की तरफ से आंदोलन में शहादत देने वाले किसानों व उन पर दर्ज मुकदमों के बारे में कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आई है। वहीं किसानों द्वारा पिछले काफी सालों से एम एस पी पर कानून बनाने की मांग को भी प्रत्येक सरकारें ठंडे बस्ते में डाल देती है और विपक्ष में बैठने पर इसको मुद्दा तो हर कोई बनाता है। लेकिन सत्ता में आते ही उनके सुर बदल जाते हैं।

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