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छान के राममेहर सहित हिसार के सात किसानों ने दी आंदोलन में शहादत

छान के राममेहर सहित हिसार के सात किसानों ने दी आंदोलन में शहादत

फाईल फोटो

पीएम ने शुक्रवार को तीनों कृषि कानून रद्द करने की घोषणा करने से एक तरफ किसानों में खुशी का माहौल है और दूसरी तरफ आंदोलन के दौरान शहादत देने वाले किसान साथियों को खोने का मलाल हमेशा खलता रहेगा। वहीं सत्ता पक्ष के नेताओं ने किसानों ‌पर जो अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया वो दिल को ठेस पहुंचाने वाले ब्यान किसी को भी नहीं देने चाहिए। क्योंकि सत्ता तो आती जाती रहती हैं। लेकिन ऐसी भाषा के इस्तेमाल से समाज में भ्रांति फैलती है।


 प्रधानमंत्री ने शुक्रवार सुबह तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की है। आंदोलन के कारण किसानों के संघर्ष की जीत हुई है। इस जीत में हरियाणा के हिसार जिले के 7 किसानों ने अपनी जान कुर्बान की है। इसमें एक किसान ने टीकरी बॉर्डर पर दो पेज का सुसाइड नोट छोड़कर आत्महत्या की थी। इसके अलावा छः अन्य किसान अलग-अलग समय पर जान गंवाई।



छान गांव के लीलू ने बताया कि उसका बड़ा भाई राममेहर किसान आंदोलन को लेकर काफी सक्रिय रहता था। लोगों को इन कानूनों के फायदे व नुकसान बताकर जागरुक भी किया करता था। वो 5 दिसंबर को ट्रैक्टर ट्रालियों में दूध, सब्जी, आटा व अन्य जरूरी सामान इकट्ठा करके टिकरी बार्डर पर जा रहा था कि 6 दिसंबर की सुबह रोहतक के खरावड़ गांव के पास ट्राली में पीछे से ट्रक ने सीधी टक्कर मार दी। जिसके कारण उसका भाई राममेहर की मौत हो गई। उसके बाद पूरे गांव ने प्रतिज्ञा कर ली कि  जब तक तीनों कृषि कानून रद्द नहीं किए जाते तब तक वो आंदोलन में अपनी भागेदारी से पीछे नहीं हटेंगे।


कुलेरी निवासी बिमला ने बताया कि उसका पति  महेंद्र सिंह थाकन टोल पर चल रहे धरने के प्रधान थे। 7 अगस्त 2021 को मेडिकल कॉलेज अग्रोहा में उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला के प्रोग्राम के विरोध में गए हुए थे कि उनकी मौत हो गई थी। आंदोलन में 750 से अधिक किसानों ने शदाहत दी है। किसानों के आगे सरकार को झुकना ही पड़ा। किसान एकता के कारण ही सरकार मजबूर हुई। उसे कानून वापस लेने पड़े। हमें सरकार पर विश्वास नहीं है। संसद में लिखित रूप में कानून रद्द करने व एमएसपी की गारंटी निर्धारित होने तक डटे रहेंगे। 


लीलाराम ने बताया कि उसके पिता रसीद  की लांधड़ी टोल पर आंदोलन के दौरान मौत हुई थी। उन्होंने किसान आंदोलन के लिए गांव में सबसे चंदा शुरू किया था। सरकार की तरफ से उन्होंने कोई सुविधा नहीं मिली। कृषि कानून वापस होने पर हमें खुशी है। किसान आंदोलन की जीत हुई। सरकार को यह फैसला एक साल पहले लेना चाहिए था। जिससे किसानों को शहादत न देनी पड़ती।


लीलू राम ने बताया कि उसका चाचा ज्ञानीराम की बरवाला में आयोजित हुई किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान मौत हो गई थी। कृषि कानून रद्द करने की घोषणा किसान आंदोलन की पहली जीत है। आंदोलन में बहुत से किसान शहीद हुए हैं। प्रधानमंत्री का यह कदम सही मायने में स्वागत योग्य कदम है। लेकिन भगवान से प्रार्थना है कि शहादत देने वाले किसानों की ही जीत है।



सिसाय निवासी युवती ने बताया कि उसके पिता 47 वर्षीय राजबीर ने कृषि कानूनों  वापस नहीं लेने से आहत होकर टीकरी बॉर्डर पर आत्महत्या कर ली थी। उन्होंने दो पेज का एक सुसाइड नोट छोड़ा था। जिसमें मरने के बाद तीनों काले कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग की थी। उनकी शहादत से हमारे परिवार को बहुत बड़ी क्षति हुई है। घर में और कमाने वाला कोई नहीं है। सरकार को शहीद हुए किसानों की सुध लेनी चाहिए। 



उगालन निवासी रामपाल ने बताया कि उसका बड़ा भाई 69 वर्षीय रामचंद्र खर्ब किसान आंदोलन में पहले दिन से ही सक्रिय था। अक्सर दिल्ली के टिकरी बॉर्डर पर ही रहकर अपनी भूमिका निभा रहा था। हिसार में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के दिन उन्होंने अपनी शहादत दी थी। हमें अपने भाई पर गर्व है। हमारा परिवार तन मन धन से किसान आंदोलन के लिए हमेशा तैयार है। हम तीनों कानून वापस लेने के फैसले का स्वागत करते हैं। फैसला लेने में काफी समय लगा दिया।

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