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ऑनलाइन डेरा प्रमुख ने अपने शिष्यों को दिए दर्शन हजारों की संख्या में पहुंचे डेरा श्रद्धालु !

 

हिसार : सरदाना / तहलका न्यूज

डेरा प्रमुख संत डा. गुरमीत राम रहीम सिंह इन्सां बुधवार को विदेशों सहित देश के कोने-कोने में बने डेरा सच्चा सौदा के विभिन्न आश्रमों, नामचर्चाघरों में बैठी साध-संगत से शाह सतनाम जी आश्रम, बरनावा उत्तर प्रदेश से ऑनलाइन गुरुकुल के माध्यम से रूबरू हुए और साध-संगत को अपना आशीर्वाद दिया। राम रहीम सिंह ने हिसार में ऑनलाइन हजारों लोगों का नशा व सामजिक बुराईंया छुड़वाते उन्हें गुरुमंत्र प्रदान किया। 







                   इस दौरान  डेरा प्रमुख ने गुरुमंत्रा के बारे में बताते हुए कहा कि गुरुमंत्रा पुरातन शब्द है। लगभग करीब 12 हजार साल पुरानी बने पाक-पवित्र वेद को हमने हमने पढ़ा है। लेकिन गुुरूमंत्रा तो उससे भी पुरातन है। इसलिए पुरातन शब्द यानि गुरुमंत्रा की सबसे पहले व्याख्या करना चाहते है। बाकि कि अपने आप आ जाएगी। गुरुमंत्रा यानि गु का मतलब अंधकार और रू का मतलब प्रकाश होता है। गु और रु शब्द के जोडऩे से बनता है जो अज्ञानता रूपी अंधकार में प्रकाश रूपी दीपक जला दें। मंत्रा का अर्थ है शब्द, युक्ति, मैथ्ड। यानि गुरू जो मालिक के शब्दों का खुद अभ्यास करता है और उससे उसे जो अनुभव होता है, वो उसे दुनिया को दें, उसे कहा जाता है गुरुमंत्रा, कलमा, मैथ्ड ऑफ मेडिटेशन और नाम शब्द। पर गुरुमंत्रा गुरु का मंत्र नहीं होता, वो मंत्र होता है उसी ओम, हरि, अल्लाह, वाहेगुरु, गॉड, परमात्मा का। 








                     डेरा प्रमुख ने कहा कि अगर किसी को आदमी-आदमी, इन्सान-इन्सान कहेंगे तो कोई नहीं उठेगा। लेकिन अगर किसी को उसके नाम से पुकारते है तो वह झट से खड़ा हो जाता है। उसी प्रकार आज के युग में, आज के दौर में देवताओं, फरिश्ताओं को भी लोग मालिक मानने लग जाते है, भगवान कहने लग जाते है, तो इसलिए उस ओम, अल्लाह ताला, दा सुप्रीम पॉवर, गॉड, हरि, वाहेगुरु, गॉड, इक ओंकार यानि ये सभी एक ही नाम है। जोकि अलग-अलग लगते जरूर है। यानि वो एक शक्ति का नाम क्या है? उसको बाईनेम पुकारना ही गुरुमंत्रा है, कलमा है। पूज्य गुरु जी ने कहा कि संत पहले उस गुरुमंत्रा का अभ्यास करते है और फिर उसे लोगों को बताते है। पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि कोई भी खेल खेलने के लिए उसका कोच चाहिए। कॉलेजों-स्कूलों में जो पढ़ाई कराई जाती है उसके लिए टीचर, मास्टर व लेक्चरार चाहिए। क्या आपने कोई स्कूल, कॉलेज ऐसा देखा है, जहां टीचर, मास्टर और लेक्चरार ना हो और किताबें पड़ी है तथा लोग जाते है और पढ़ लेते है और फिर पढ़कर डिग्रिया हासिल कर लेते है। क्या है कोई ऐसा स्कूल कॉलेज?। ऐसा कोई स्कूल कॉलेज आपको नहीं मिलेगा। पूज्य गुरु जी ने कहा कि यह सब दुनियावी पढ़ाई है, जो लिखा है या तो वो इतिहास है या फिर प्रेक्टिकली लाइफ में दिखता है। लेकिन अल्लाह, वाहेगुरु, गॉड, खुदा, रब्ब तक जाने का मार्ग तो दिखता ही नहीं, वो खुद भी सामने होते हुए भी नजर आता ही नहीं। क्योंकि आपकी आंखों के आगे पर्र्दे आए हुए है। जैसे मोतियाबिंद हो जाता है। इसलिए संतों ने लिखा है कि आज की दुनिया को मोतियाबिंद हुआ पड़ा है। 










राम रहीम ने कहा कि हैरानी की बात है कि वो परमात्मा अंदर होते हुए भी इन्सान को नहीं दिखता। उसकी आवाज अंदर चलते हुए भी नहीं सुनती। इसलिए इन्सान को जो मातियाबिंद हुआ होता है उसका आप्रेशन करने के लिए संत पीर फकीर की जरूरत होती है। जो सही रास्ता दिखाए, उन्हें संत पीर फकीर कहा जाता है। संत कभी भी किसी को सत्संग सुनाने के बदले पैसा आदि नहीं लेते, यानि झोलिया नहीं फैलाते। पूज्य गुरु जी ने कहा कि भगवान, अल्लाह, वाहेगुरु दाता था, दाता है और दाता ही रहेगा। अगर वो दाता है तो उसका फकीर मंगता कैसे हो सकता है, सवाल ही पैदा नहीं हो सकता। पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि अगर इन्सान कर्म करके खा सकता है तो हाथ-पैर हमारे भी है, हम कर्म क्यूं नहीं कर सकते? किसने रोका है कर्म करने से, कर्म करके खाना चाहिए। मेहनत और हक हलाल की कमाई करके खाना चाहिए।










 राम रहीम ने कहा कि ये कहा लिखा है कि संत दूसरों को कर्म करने की शिक्षा दें और खुद बैठे-बैठे खाते रहे, यह किस ग्रंथ में लिखा है। यह सच्चाई है जो सभी को कड़वी लगती है। पूज्य गुरु जी ने कहा है कि सभी धर्मो में लिखा है कि मालिक के मंगते बनो, अगर आप लोग मालिक को ही देने चले जाते हो तो वो सोचता है कि इसके पास पहले ही फालतू है जो मुझे देने आ रहा है। इसलिए इसको ओर देने की क्या जरूरत है। इसलिए ना तो जो सच्चे संत होते है वो किसी से कुछ लेते है और रही बात ओम, हरि, अल्लाह, वाहेगुरु की तो उन्होंने तो लेना ही क्या है। वो तो दाता है। पूज्य गुरु जी ने कहा कि जो परमात्मा हमें बना सकता है, क्या वो इन्सान के बनाए हुए कागज के टुकड़े रूपए को नहीं बना सकता। पूज्य गुरु जी ने कहा कि परमात्मा इन्सान के अंदर है। लेकिन फिर भी वह उसे दूर समझता है। ऐसा सोचना इन्सान की नादानी है, या फिर यूं कह सकते है कि यह सब काम-वासन, क्रोध, लोभ, मोह अंहकार के पर्दे है। इसी अज्ञानता को दूर करने के लिए ही संत पीर फकीर इस धरती पर आते थे, आ रहे है और आते ही रहेंगे। पूज्य गुरु जी ने कहा कि यह बुराई का दौर चल रहा है, जिसे कलियुग कहा जाता है। इस समय में काल की शक्तिया ज्यादा हावी है। इसमें बुराई की बाते सिखना आसान है। लेकिन इन्सान इस दौर में परमात्मा की बाते जल्दी नहीं सिख पाता। इसलिए लोगों को भगवान के नाम से जोडऩे के लिए संत-पीर फकीरों को आना ही पड़ता था, आ ही रहे है और आते ही रहेंगे। संत कभी भी अपनी मान बढाई के भूखे नही होते। पूज्य गुरु जी ने कहा कि संत जो होते है वो जितनी मालिक की औलाद होती है, उसको अपनी औलाद मानके उसकी सेवा करता है। चाहे उसे कोई गाली दें, चाहे कोई उसे बुरा कहें, लेकिन संत उसके लिए सदा आशीर्वाद ही देता है।  











पूज्य गुरु  ने कहा कि मालिक, अल्लाह, वाहेगुरु, गॉड, ओम, हरि उसके अरबो नाम है। पर वो कण-कण में है। हमने हमारे सभी धर्मो के पाक पवित्र ग्रंथों को पढ़ा। आपको रोज बोलते है कि पढऩे का सभी का नजरिया अलग-अलग होता है। हमारा नजरिया बेपरवाह साईं शाह सतनाम, शाह मस्ताना जी दाता रहबर ने ऐसा बना दिया। जिसमें हमने सभी पाक-पवित्र ग्रंथों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पढ़ा। सभी संत महापुरूषों की रचना को हमने पढ़ा है, जिनमें लगभग सबकुछ कोमन है, सब कुछ सेम है। कहने का अंदाज अलग है, लेकिन बात सभी एक जैसी ही है। 










            राम रहीम ने कहा कि पानी को जल, वाटर, वाशर,नीर, इनके बहुत से नाम है। क्या इनके नाम बदलने से इसका रंग या स्वाद बदलता है, नहीं। उसी तरह अलग-अलग भाषाओं में उस सुप्रिम पॉवर यानि शक्ति  के अलग-अलग नाम है। लेकिन वो ना तो कभी बदला था, ना बदला है और ना ही कभी बदलेगा। वो एक था, एक है और एक ही रहेगा। उस जैसा ना तो कभी कोई हुआ था, ना ही हुआ है और ना ही कभी उस जैसा कोई होगा। कण-कण जर्रे-जर्रे में मौजूद है वो। इन्सान का शरीर भी बहुत बड़ा कण है। इसलिए वो आपके अंदर भी रहता है, वो रोम-रोम में रहता है। लेकिन आप लोगों की निगाहें ही नहीं पड़ती। यह हैरानीजनक बात है कि वो आपके अंदर आवाज दे रहा है कि मेरी आवाज सुन लो। लेकिन आप लोग उसे बाहर आवाज देकर ढूंढ रहे है। पूज्य गुरु जी ने कहा कि हम सर्वधर्म की बात करते है, जिसमें साफ लिखा है कि वो दिमाग, विचारों, दिल में है और शरीर रूपी मंदिर, मस्जिद,गुरुद्वारा, गिरजाघर में भी वो बैठा हुआ है। 










 गुरु ने कहा कि एक शब्द है जिसे अलग-अलग आवाज का नाम दिया गया है। वो मालिक की आवाज है। जिसे हिंदु धर्म में धुन, सिख धर्म में अनहद बाणी या धुर की बाणी, इस्लाम धर्म में बांगे इलाही, कलमा ए पाक और इसाई धर्म में गॉडस वाइस एंड लाइट या लाइट एंड साउंड का नाम दिया गया है। भाषा बदलने से कोई फर्क नहीं पड़ता। मतलब सभी का एक ही है। उसने आपके अंदर एक आवाज छोड़ रखी है और अगर इन्सान उसको अंदर से फोलो करेगा तो उस तक पहुंचा जा सकता है। लेकिन इन्सान के कानों पर तो काम, वासना, क्रोध, लोभ, मोह, अंहकार, मन, माया, चुंगली, निंदा, ठगी, बेइमानी की मोहरे लगी हुई है जम के। इस कारण दूसरी कोई आवाज दिखाई देती ही नहीं। जो खुद के अंदर आवाज चल रही है, उसकी ओर निगाहे जाती ही नहीं। कैसे उसको निगाह तक लेकर जाए, इसको लेकर ध्यान एकाग्र करना होगा। मैथ्ड ऑफ मेडिटेशन, गुरुमंत्रा, कलमा, नाम शब्द का अभ्यास करना होगा। 






dera sacha sauda, dera chief sant gurmeet-ram rahim,

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