हिसार : चेक बांउस के मामले में तीन आरोपी बरी
Three accused acquitted in check bounce case
बीज विज्ञान सीड प्रोड्यूशर कंपनी लिमिटेड ( Beej Vigyan Seed Producer Company Limited ) ने ग्रामीण उत्थान समिति व उसके प्रधान और सचिव पर दायर किया था केस
तहलका न्यूज हिसार / सुनील कोहाड़
चेक बाउंस के करीब साढ़े तीन साल पुराने मामले में न्यायिक दंडाधिकारी हरजोत कौर की अदालत ने टोकस गांव स्थित ग्रामीण उत्थान समिति, समिति के सचिव सुरेंद्र सिंह व प्रधान सतीश कुमार को बरी कर दिया। चेक बाउंस के मामले में बने कानून बड़े सख्त हैं और 90 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में सजा होती है।
आरोपितों की तरफ से पैरवी करने वाले अधिवक्ता नवीन राजली ने बताया कि इस बारे में राजगढ़ रोड़ स्थित बीज विज्ञान प्रोड्यूशर कंपनी लिमिटेड के निदेशक विनोद बैनिवाल ने 16 अगस्त, 2019 को केस दायर किया था। विनोद बैनिवाल ने अपनी शिकायत में अदालत को बताया था कि उसकी कंपनी का नाबार्ड ग्रांट पर आरोपित कंपनी के साथ एमओयू हुआ था। जिसके तहत आरोपित कंपनी उसकी कंपनी को प्रमोट करना था। नाबार्ड की एक ग्रांट की एवज में आरोपितों द्वारा दिया गया 84 हजार रुपये का एक चेक बाउंस हो गया था। अपने बचाव में आरोपितों ने कहा कि शिकायतकर्ता कंपनी के सीईओ की तनख्वाह व कार्यालय के किराए की एवज 84 हजार रुपये का चेक दिया गया था। लेकिन तनख्वाह व किराए के बिल फर्जी थे, इसलिए उन्होंने चेक की स्टॉप पेमेंट की थी। इसके बाद उन्होंने नाबार्ड के निर्देशों पर सीईओ की तनख्वाह व कार्यालय का किराया दे दिया था। इसके आधार पर आरोपितों ने यह साबित कर दिया कि उन्होंने शिकायतकर्ता को जो चेक दिया था, वह कानूनी देनदारी के तहत नहीं दिया गया था। इस आधार पर अदालत ने सभी आरोपितों को बरी करार दे दिया।
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| नवीन राजली एडवोकेट |
आरोपितों की तरफ से पैरवी करने वाले अधिवक्ता नवीन राजली ने बताया कि इस बारे में राजगढ़ रोड़ स्थित बीज विज्ञान प्रोड्यूशर कंपनी लिमिटेड के निदेशक विनोद बैनिवाल ने 16 अगस्त, 2019 को केस दायर किया था। विनोद बैनिवाल ने अपनी शिकायत में अदालत को बताया था कि उसकी कंपनी का नाबार्ड ग्रांट पर आरोपित कंपनी के साथ एमओयू हुआ था। जिसके तहत आरोपित कंपनी उसकी कंपनी को प्रमोट करना था। नाबार्ड की एक ग्रांट की एवज में आरोपितों द्वारा दिया गया 84 हजार रुपये का एक चेक बाउंस हो गया था। अपने बचाव में आरोपितों ने कहा कि शिकायतकर्ता कंपनी के सीईओ की तनख्वाह व कार्यालय के किराए की एवज 84 हजार रुपये का चेक दिया गया था। लेकिन तनख्वाह व किराए के बिल फर्जी थे, इसलिए उन्होंने चेक की स्टॉप पेमेंट की थी। इसके बाद उन्होंने नाबार्ड के निर्देशों पर सीईओ की तनख्वाह व कार्यालय का किराया दे दिया था। इसके आधार पर आरोपितों ने यह साबित कर दिया कि उन्होंने शिकायतकर्ता को जो चेक दिया था, वह कानूनी देनदारी के तहत नहीं दिया गया था। इस आधार पर अदालत ने सभी आरोपितों को बरी करार दे दिया।


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